पवत हरी-भरी पहािड़यां अगर आप भारत के भौितक नशे क ओर यान से देख तो पाएंगे िक भारत को बहत-सी पवतमालाओं को बारीक से देखने पर ऐसा लगता है जैसे िकसी ने उह मब तरीके से सजाया हो। ये पवतमालाएं भारत क धरती के लए एक तंबूनुमा छत का काम करती ह। इस छत क सबसे ऊपरी सतह अपने िनधारत थान से थोड़ी हटी हई सी लगती है। ये भारत के पूरब से लेकर पचम तक फैली हई ह। पचम क तरफ, ये पवतमालाएं छोटी होती हईं जद ही पािकतान म जाकर खम हो जाती ह। पर पूरब म ये दूर तक फैली ह, और घुमावदार मोड़ लेते हए ये बंगाल क खाड़ी के आसपास खम होती ह। अगर हम इस तंबूनुमा छत क बात कर तो ये पवतमालाएं अपनी उंची चोिटय के लए िवविवयात ह। ये चोिटयां जो िक लगभग 22000 फट (6080 मीटर) तक ऊंची ह, िवव क सबसे ऊंची चोिटय म िगनी जाती ह। इन िहमालयी पवतमालाओं क तराई म एक चौड़ी-मोटी पी समतली और उपजाऊ जमीन क है। इसे भारतीय गंगा का कछार कहते ह। इनक बनावट को देखकर यूं लगता है जैसे िकसी ने अपने िवशाल हाथ से इह गढ़ा है, तािक पहाड़ पर जमी बफ िपघलकर समतली जमीन क ओर बहती जाए और हम उस जमीन को सचकर कृिष योय बनाने म मदद करे। दूसरी सबसे ऊंची पवत-चोिटयां दूर दिण के नीलिगरी और अामलाई पवतमालाओं म पाई जाती ह। इन पवतमालाओं के नीचे जो समतली जमीन है, उनक ऊंचाई लगभग 2000 फट (608 मीटर) है। ये पहािड़यां, घािटयां और समतली जमीन िमलकर एक उपयोगी जमीनी संरचना तैयार करते ह। इनके अलावा सबसे रोचक ढंग से जो पवतमाला फैली है वह है पचमी घाट; ये पवतमाला पचमी तट के समक चलती हईं, मुंबई के थोड़े उर क ओर से शु होकर कयाकुमारी तक जाती ह। हम भायशाली ह िक हम इतनी तरह क पवतमालाएं, पहािड़यां और पठार का उपहार कृित से िमला है। ये पहािड़यां और पवतमालाएं न सफ दशनीय होती ह, बक ये भूिम को उपजाऊ बनाने म भी मुय भूिमका िनभाती ह। अगर हम इन पहािड़य और पवतमालाओं का उपहार न िमला होता तो हमारी समतली भूिम कृिष योय न रहकर, साइबेरया के रेिगतान क तरह रेतीली और बंजर बन गई होती। आइए, हम इनके ित अपनी कृतता कट कर और मालूम कर िक पहाड़ हमारे लए िकस कदर उपयोगी ह। अब हम चचा करते ह िक िहमालय देश के उरी िकनार को ाकृितक सदय से परपूण करने और हम सबसे ऊंची पवत चोिटय का उराधकारी बनाने के अलावा और या-या करता है। सबसे पहले तो यह अपनी ऊंचाई के कारण साइबेरया क ओर से आती हई सद, शुक हवाओं को रोकता है और देश के अंदर ऊण, नम मानसूनी हवाओं को अंदर ही समेटे रखने म मदद करता है। अगर हमारे पास ये पवत और पहािड़यां न होती तो हमारी जलवायु और भू संरचना अलग ही होती। साइबेरया से आती हई सद, शुक हवाएं सीधे हमारे देश म आ जात और उरी भाग को ठंडे, सद भाग म बदल िदया होता। आइए, देखते ह िक जलवायु और बरसात के अलावा हम और िकन चीज के लए िहमालय के कजदार ह। हम िहमालय के आभारी ह उन िवशाल निदय के लए जो िहमालय के नीचे क चौड़ी, समतली भूिम को उवर और कृिष योय बनाती ह। िहमालय क ऊपरी सतह पर जमी बफ क मोटी परत लगातार िपघलती रहती है और िहमालय क तराई से िनकलने वाली निदय को हर व पानी से लबालब भरे रखती है। ये थायी निदयां देश के उरी भाग म पूरे साल बहती ह। इन थायी निदय के मुकाबले अय सभी निदयां अथायी होती ह और बरसात का पानी न िमलने पर सूख जाती ह। आमतौर पर बरसाती निदयां (कृणा और गोदावरी को छोड़कर) या तो सूख जाती ह या बरसात खम होते ही पतले नाले म बदल जाती ह। पर गंगा, संधु और पु सिहत सारी निदयां, जनक उप िहमालय से होती है, अपने छोटे- छोटे नाल, झरन समेत साल भर पानी से भरी बहती रहती इसलए म िहमालय को धयवाद देना चािहए, जसने हम इन निदय के प म इतना पानी मुहैया करवाया जसके िबना पूरा उर भारत रेिगतान बन गया होता। िहमालय क ढलान पर पाई जाने वाली वनपयां उरी गोला म पाई जाने वाली वनपितय का ही छोटा ितप है, जो कुछ िकलोमीटर के दायरे म ही समट गया है। आप पाएंगे िक िहमालय क अलग-अलग अांतर पर िमलते ह। नीचे क ढलान पर उणकिटबंधीय पेड़ जैसे शोरया रोबटा (कॉपी) पाए जाते ह। थोड़ी ऊंचाई पर देवदार और बुरांस जैसे शीतोण किटबंधीय पेड़ पाए जाते ह। इस ऊंचाई क ढलान का उपयोग सेब, नाशपाती, आडू, आलुबुखारा जैसे शीतोण फल को उगाने के लए होता है। असल म भारतीय बाजार म िमलने वाले यादातर सेब और नाशपाती इह िहमालयी ढलान क देन ह। िहमालय क सबसे ऊंची पी पर चीड़ पाए जाते ह, इनक पयां सुईनुमा होती ह, जनके कारण ये सदाबाहर होते ह। और हर किठनाई झेलते हए कड़ी से कड़ी ठंढ़ भी सह जाते ह। इन चीड़ वृ क पहाड़ी पी सिदय से हमारे लए इमारती लकड़ी क पूित करती पूव िहमालय पर िभ पिय म िविवध वनपय का फैलाव नाटकयता लए हए ह। िहमालय के पूरब क तरफ पहािड़य क ऊंचाई घटती जाती है, इसी वजह से तराई के जंगल हरे-भरे और उणकिटबंधीय वृ से भरे होते ह। िहमालय पर वनपितय क िविवधता का अंदाजा आस बात से लगाया जा सकता है िक आप जीप से आधे िदन म ही तराई के ऊणकिटबंधीय जंगल से होते हए सबसे ऊंचे िशखर पर जमी बफ तक पहंच सकते ह। सबसे ऊंचे पवत िशखर के आसपास चीड़ के वृ भी नह पाए जाते, यिक तेज हवा के कारण वहां क िमी उड़ जाती है और केवल चान रह जाती ह। पर जैसे जैसे आप िहमालय पवतमालाओं क ओर बढ़ते जाएंगे, आप पाएंगे िक यहां समान ऊंचाई क असंय पहािड़यां ह और उन पर वनपितयां िकसी म के अनुसार नह होत। इन पवत क तराईय और ऊंचे िशखर के बीच म घािटयां होती ह, जो लगभग समतल होती ह। इन घािटय म खेती बारी और पशुपालन िकया जाता है। िकसी भी देश क समृि का आकलन उसक भूिम क उवरता और मीठे पानी के जलोत से लगाया जा सकता है। भूिम क सबसे ऊपरी सतह क कुछ सटीमीटर मोटी िमी को उवर िमी कहते ह। इसी िमी म बीज उग सकते ह और पौध को पोषण िमलता है। हक ढलान पर (30 िडी से कम) हरी घास क मोटी परत होती है और यह घास, िमी को अपनी जड़ म मजबूती के साथ बांधे रखती है। घास क ढलाने भेड़ के लए अछे चारागाह का काम करती ह। भेड़ इन ढलान क घास को चरकर उनको और अधक घना पैदा कर देती ह। यूं तो भेड़ भी नई पौध को बकरय क तरह खा जाती ह, पर जब तक ऊंची ढलान पर ऊंचे पेड़ के नीचे घास है, भेड़ को कभी चारे क कमी नह होगी और ना ही हम उनक। पर जैसे-जैसे ढलान सीधी होती जाती ह, उन पर जमी िमी क परत को पकड़कर रखने के लए िकसी ऐसी चीज क जरत होती है जो िक मजबूत पंज क तरह काय करे। दूसरे शद म, हम बड़े पेड़ क फैलावदार व चान को भेद सकने वाली जड़ क जरत होती है। पवतीय ढलान पर िमी को रोक सकने म और कोई चीज इतनी कारगर हो ही नह सकती। िमी रोकने वाले इन पेड़ को न केवल िभ जाितय का होना चािहए, बक उह एक दूसरे के बहत पास-पास भी होना चािहए, तािक उनक जड़ आपस म गुंथी रह। हम अलग-अलग तरह क जड भी चािहए; जैसे गहरी और भेदने वाली जड़ और उथली व फैलावदार जड़। इन पेड़ क पयां इतनी घनी और िवतृत होती ह िक ये छतरी क तरह काम कर बारश के पानी को सीधा जमीन पर िगरने से रोक लेती ह। बारश पहले इनके घने प क छतरी पर िगरती है और धीरे-धीरे रसते हए जमीन क ओर आती है। इस तरह से न सफ िमी को बहने से बचाते ह बक जमीन के जल तर को बढ़ाने म भी मददगार होते ह। पानी को जमीन म रसने और भू-गभय झरन को बनने देने के लए पानी का जमीन पर देर तक के रहना जरी है अगर पानी ढलान पर बह जाए तो यह असंभव हो जाएगा। संभवतः यही वजह है िक कृित ने इन ढलान पर पानी रोकने क यवथा खुद ही क हई है। इन पेड़ के बाद ढलान से बहते पानी क तेज रतार को ऊंची नीची जमीन और चान रोकती ह, तािक जमीन को पानी सोखने का भरपूर समय िमल जाए। इस तरह पानी बहकर बरबाद नह होता। भारी बरसात म भी थोड़ी बहत िमी के बह जाने का खतरा तो है ही, पर पेड़ क मजबूत जड़ िमी को बहने से रोक लेती ह। इस तरह ढलान से बहकर नीचे आने वाला पानी साफ होता है तथा यह मटमैला नह होता। संभवतया यही पानी नीचे आकर झरने का प ले लेता है। इस तरह हम इस िनकष पर पहंचते ह िक अगर पहाड़ के ऊपर पेड़ का घनव और घने घास क बहतायत हो तो सारी समयाएं एक हद तक अपने आप हल हो जाती ह। इनक वजह से झील म गाद नह भरेगी और नदी नाल का पानी गंदा और मटमैला नह होगा। यह िनमल पानी घािटय और मैदान म खेती के काम आ यह यान म रखने वाली बात है िक पहािडय को ढंके रखने के लए सबसे आदश पणपाती जंगल होते ह, जो िभ-िभ जाितय के पेड़ का समण होते ह। और सिदय से लगभग हमारी सभी पवतमालाओं पर इस तरह के जंगल ाकृितक ढंग से पनप चुके ह
शुक्रवार, 24 मई 2013
पर्यावरण वचाव
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