बुधवार, 29 मई 2013
मंगलवार, 28 मई 2013
सोमवार, 27 मई 2013
यूँ ही
अगला जन्म भी पाऊँ तुम्हारे लीए।।
साथ मेरे यूँ ही चलते रहना ।
तरु छाया में यूँ ही इंतजार करना ।।
चांदनी रात में यूँ ही अश्रु बहाना।
मैं वापस आऊंगा श्वेत अश्व में बैठ कर ।।
तुम यूँ ही तैयार रहना ।
तुम से जन्म जन्मों का इकरार है ।।
हर जन्म में यूँ ही मीलते रहना ।
कभी दूर जाने की जुरत करूं तो तुम उस रास्ते में यूँ ही तैयार रहना ।।
लाख कोशीश करूं तुम से दूर जाने की तुम सावित्री बन कर यूँ ही तैयार रहना ।
यूँ तो चाहने भर से कुछ नहीं होता साथ तुम मेरा यूँ ही देते रहना ।।
अगला जन्म मीले न मीले लेकीन तुम यूँ ही तैयार रहना ।
ख्वाब में सही तुम यूँ ही दीदार करते रहना ।।
मैं तुम्हे चाँद के बहाने देखूं तुम यूँ ही चांदनी बन देखना ।
मैं तुम्हें फल के बहाने देखूं तो तुम यूँ ही रसधार बन कर बहना ।।
मैं तुम्हे प्रकृती बन कर नीहारु तुम यूँ ही अंगड़ाई लेते रहना ।
मेरे ख्वाब का आलम तो देखो तुम यूँ ही मुस्कराते रहना ।।
तुम नहीं मीलती तो मुझे अवसाद घेर लेता है तुम यूँ ही अवसाद से उभार लेना ।
बहे बयार हवा की समझ लेना मैं आ रहा हूँ तुम यूँ ही झुरमुटों में इंतजार करना ।।
Lyrics of Hindi Song Jan Gan Man Adhinayak Jay Ho
jan gan man adhinayak jay ho, bharat bhagy vidhata
punjab sindh gujarat maratha, dravid utkal bang
vindhy himanchal jamuna ganga, uchchhal jaladhit rang
tab shubh name jage, tab shubh aashish mange
gaye tab jay gatha
jan gan mangal dayak jay he, bharat bhagy vidhata
jay he jay he jay he, jay jay jay jay he......
HindiSongLyrics | Lyrics of Hindi Song Jan Gan Man Adhinayak Jay Ho
शुक्रवार, 24 मई 2013
दरिया उफान पर है
गजल क जान न ले ल जबान के झगड़े।।
जब धूप का समदर कुल आसमान पर है।
ऐसे म, इक परदा पहली उड़ान पर है।।
या रब तू ही बचाना आफत सी जान पर है,
िफर तीर इक नजर का ितरछी कमान पर है।
उस पार से मुहबत आवाज दे रही है,
दरया उफान पर है िदल इतहान पर है।
सोहन से भले ही वािकफ न हो जमाना,
गजल का उसक चचा सबक जुबान पर है
पर्यावरण वचाव
पवत हरी-भरी पहािड़यां अगर आप भारत के भौितक नशे क ओर यान से देख तो पाएंगे िक भारत को बहत-सी पवतमालाओं को बारीक से देखने पर ऐसा लगता है जैसे िकसी ने उह मब तरीके से सजाया हो। ये पवतमालाएं भारत क धरती के लए एक तंबूनुमा छत का काम करती ह। इस छत क सबसे ऊपरी सतह अपने िनधारत थान से थोड़ी हटी हई सी लगती है। ये भारत के पूरब से लेकर पचम तक फैली हई ह। पचम क तरफ, ये पवतमालाएं छोटी होती हईं जद ही पािकतान म जाकर खम हो जाती ह। पर पूरब म ये दूर तक फैली ह, और घुमावदार मोड़ लेते हए ये बंगाल क खाड़ी के आसपास खम होती ह। अगर हम इस तंबूनुमा छत क बात कर तो ये पवतमालाएं अपनी उंची चोिटय के लए िवविवयात ह। ये चोिटयां जो िक लगभग 22000 फट (6080 मीटर) तक ऊंची ह, िवव क सबसे ऊंची चोिटय म िगनी जाती ह। इन िहमालयी पवतमालाओं क तराई म एक चौड़ी-मोटी पी समतली और उपजाऊ जमीन क है। इसे भारतीय गंगा का कछार कहते ह। इनक बनावट को देखकर यूं लगता है जैसे िकसी ने अपने िवशाल हाथ से इह गढ़ा है, तािक पहाड़ पर जमी बफ िपघलकर समतली जमीन क ओर बहती जाए और हम उस जमीन को सचकर कृिष योय बनाने म मदद करे। दूसरी सबसे ऊंची पवत-चोिटयां दूर दिण के नीलिगरी और अामलाई पवतमालाओं म पाई जाती ह। इन पवतमालाओं के नीचे जो समतली जमीन है, उनक ऊंचाई लगभग 2000 फट (608 मीटर) है। ये पहािड़यां, घािटयां और समतली जमीन िमलकर एक उपयोगी जमीनी संरचना तैयार करते ह। इनके अलावा सबसे रोचक ढंग से जो पवतमाला फैली है वह है पचमी घाट; ये पवतमाला पचमी तट के समक चलती हईं, मुंबई के थोड़े उर क ओर से शु होकर कयाकुमारी तक जाती ह। हम भायशाली ह िक हम इतनी तरह क पवतमालाएं, पहािड़यां और पठार का उपहार कृित से िमला है। ये पहािड़यां और पवतमालाएं न सफ दशनीय होती ह, बक ये भूिम को उपजाऊ बनाने म भी मुय भूिमका िनभाती ह। अगर हम इन पहािड़य और पवतमालाओं का उपहार न िमला होता तो हमारी समतली भूिम कृिष योय न रहकर, साइबेरया के रेिगतान क तरह रेतीली और बंजर बन गई होती। आइए, हम इनके ित अपनी कृतता कट कर और मालूम कर िक पहाड़ हमारे लए िकस कदर उपयोगी ह। अब हम चचा करते ह िक िहमालय देश के उरी िकनार को ाकृितक सदय से परपूण करने और हम सबसे ऊंची पवत चोिटय का उराधकारी बनाने के अलावा और या-या करता है। सबसे पहले तो यह अपनी ऊंचाई के कारण साइबेरया क ओर से आती हई सद, शुक हवाओं को रोकता है और देश के अंदर ऊण, नम मानसूनी हवाओं को अंदर ही समेटे रखने म मदद करता है। अगर हमारे पास ये पवत और पहािड़यां न होती तो हमारी जलवायु और भू संरचना अलग ही होती। साइबेरया से आती हई सद, शुक हवाएं सीधे हमारे देश म आ जात और उरी भाग को ठंडे, सद भाग म बदल िदया होता। आइए, देखते ह िक जलवायु और बरसात के अलावा हम और िकन चीज के लए िहमालय के कजदार ह। हम िहमालय के आभारी ह उन िवशाल निदय के लए जो िहमालय के नीचे क चौड़ी, समतली भूिम को उवर और कृिष योय बनाती ह। िहमालय क ऊपरी सतह पर जमी बफ क मोटी परत लगातार िपघलती रहती है और िहमालय क तराई से िनकलने वाली निदय को हर व पानी से लबालब भरे रखती है। ये थायी निदयां देश के उरी भाग म पूरे साल बहती ह। इन थायी निदय के मुकाबले अय सभी निदयां अथायी होती ह और बरसात का पानी न िमलने पर सूख जाती ह। आमतौर पर बरसाती निदयां (कृणा और गोदावरी को छोड़कर) या तो सूख जाती ह या बरसात खम होते ही पतले नाले म बदल जाती ह। पर गंगा, संधु और पु सिहत सारी निदयां, जनक उप िहमालय से होती है, अपने छोटे- छोटे नाल, झरन समेत साल भर पानी से भरी बहती रहती इसलए म िहमालय को धयवाद देना चािहए, जसने हम इन निदय के प म इतना पानी मुहैया करवाया जसके िबना पूरा उर भारत रेिगतान बन गया होता। िहमालय क ढलान पर पाई जाने वाली वनपयां उरी गोला म पाई जाने वाली वनपितय का ही छोटा ितप है, जो कुछ िकलोमीटर के दायरे म ही समट गया है। आप पाएंगे िक िहमालय क अलग-अलग अांतर पर िमलते ह। नीचे क ढलान पर उणकिटबंधीय पेड़ जैसे शोरया रोबटा (कॉपी) पाए जाते ह। थोड़ी ऊंचाई पर देवदार और बुरांस जैसे शीतोण किटबंधीय पेड़ पाए जाते ह। इस ऊंचाई क ढलान का उपयोग सेब, नाशपाती, आडू, आलुबुखारा जैसे शीतोण फल को उगाने के लए होता है। असल म भारतीय बाजार म िमलने वाले यादातर सेब और नाशपाती इह िहमालयी ढलान क देन ह। िहमालय क सबसे ऊंची पी पर चीड़ पाए जाते ह, इनक पयां सुईनुमा होती ह, जनके कारण ये सदाबाहर होते ह। और हर किठनाई झेलते हए कड़ी से कड़ी ठंढ़ भी सह जाते ह। इन चीड़ वृ क पहाड़ी पी सिदय से हमारे लए इमारती लकड़ी क पूित करती पूव िहमालय पर िभ पिय म िविवध वनपय का फैलाव नाटकयता लए हए ह। िहमालय के पूरब क तरफ पहािड़य क ऊंचाई घटती जाती है, इसी वजह से तराई के जंगल हरे-भरे और उणकिटबंधीय वृ से भरे होते ह। िहमालय पर वनपितय क िविवधता का अंदाजा आस बात से लगाया जा सकता है िक आप जीप से आधे िदन म ही तराई के ऊणकिटबंधीय जंगल से होते हए सबसे ऊंचे िशखर पर जमी बफ तक पहंच सकते ह। सबसे ऊंचे पवत िशखर के आसपास चीड़ के वृ भी नह पाए जाते, यिक तेज हवा के कारण वहां क िमी उड़ जाती है और केवल चान रह जाती ह। पर जैसे जैसे आप िहमालय पवतमालाओं क ओर बढ़ते जाएंगे, आप पाएंगे िक यहां समान ऊंचाई क असंय पहािड़यां ह और उन पर वनपितयां िकसी म के अनुसार नह होत। इन पवत क तराईय और ऊंचे िशखर के बीच म घािटयां होती ह, जो लगभग समतल होती ह। इन घािटय म खेती बारी और पशुपालन िकया जाता है। िकसी भी देश क समृि का आकलन उसक भूिम क उवरता और मीठे पानी के जलोत से लगाया जा सकता है। भूिम क सबसे ऊपरी सतह क कुछ सटीमीटर मोटी िमी को उवर िमी कहते ह। इसी िमी म बीज उग सकते ह और पौध को पोषण िमलता है। हक ढलान पर (30 िडी से कम) हरी घास क मोटी परत होती है और यह घास, िमी को अपनी जड़ म मजबूती के साथ बांधे रखती है। घास क ढलाने भेड़ के लए अछे चारागाह का काम करती ह। भेड़ इन ढलान क घास को चरकर उनको और अधक घना पैदा कर देती ह। यूं तो भेड़ भी नई पौध को बकरय क तरह खा जाती ह, पर जब तक ऊंची ढलान पर ऊंचे पेड़ के नीचे घास है, भेड़ को कभी चारे क कमी नह होगी और ना ही हम उनक। पर जैसे-जैसे ढलान सीधी होती जाती ह, उन पर जमी िमी क परत को पकड़कर रखने के लए िकसी ऐसी चीज क जरत होती है जो िक मजबूत पंज क तरह काय करे। दूसरे शद म, हम बड़े पेड़ क फैलावदार व चान को भेद सकने वाली जड़ क जरत होती है। पवतीय ढलान पर िमी को रोक सकने म और कोई चीज इतनी कारगर हो ही नह सकती। िमी रोकने वाले इन पेड़ को न केवल िभ जाितय का होना चािहए, बक उह एक दूसरे के बहत पास-पास भी होना चािहए, तािक उनक जड़ आपस म गुंथी रह। हम अलग-अलग तरह क जड भी चािहए; जैसे गहरी और भेदने वाली जड़ और उथली व फैलावदार जड़। इन पेड़ क पयां इतनी घनी और िवतृत होती ह िक ये छतरी क तरह काम कर बारश के पानी को सीधा जमीन पर िगरने से रोक लेती ह। बारश पहले इनके घने प क छतरी पर िगरती है और धीरे-धीरे रसते हए जमीन क ओर आती है। इस तरह से न सफ िमी को बहने से बचाते ह बक जमीन के जल तर को बढ़ाने म भी मददगार होते ह। पानी को जमीन म रसने और भू-गभय झरन को बनने देने के लए पानी का जमीन पर देर तक के रहना जरी है अगर पानी ढलान पर बह जाए तो यह असंभव हो जाएगा। संभवतः यही वजह है िक कृित ने इन ढलान पर पानी रोकने क यवथा खुद ही क हई है। इन पेड़ के बाद ढलान से बहते पानी क तेज रतार को ऊंची नीची जमीन और चान रोकती ह, तािक जमीन को पानी सोखने का भरपूर समय िमल जाए। इस तरह पानी बहकर बरबाद नह होता। भारी बरसात म भी थोड़ी बहत िमी के बह जाने का खतरा तो है ही, पर पेड़ क मजबूत जड़ िमी को बहने से रोक लेती ह। इस तरह ढलान से बहकर नीचे आने वाला पानी साफ होता है तथा यह मटमैला नह होता। संभवतया यही पानी नीचे आकर झरने का प ले लेता है। इस तरह हम इस िनकष पर पहंचते ह िक अगर पहाड़ के ऊपर पेड़ का घनव और घने घास क बहतायत हो तो सारी समयाएं एक हद तक अपने आप हल हो जाती ह। इनक वजह से झील म गाद नह भरेगी और नदी नाल का पानी गंदा और मटमैला नह होगा। यह िनमल पानी घािटय और मैदान म खेती के काम आ यह यान म रखने वाली बात है िक पहािडय को ढंके रखने के लए सबसे आदश पणपाती जंगल होते ह, जो िभ-िभ जाितय के पेड़ का समण होते ह। और सिदय से लगभग हमारी सभी पवतमालाओं पर इस तरह के जंगल ाकृितक ढंग से पनप चुके ह
सुँदर वचन
सू वचन ान का सार होते ह। हमारे मनीिषय, िवान, महापुष, नीित के अनुभव, दशन और परपव िवचार से हमारा जीवनपथ शत होता है। सूियाँ हमारी मानसकता व िवचार का िनमाण करती ह। अनेक अवसर व परथितय म ये िकसी सुद् िम क भाँित हमारा पथ-दशन करती ह। जीवन के महवपूण िनणय क पूव-पीिठका तैयार करती ह। सू वचन क महानता, महा एवं उपयोिगता को देखते हए तुत कृित तैयार क गई है। अयंत पठनीय, यावहारक व संहणीय सूिय का संह। अमर सूियाँ अंतःकरण अछा अंतःकरण सवम ईवर है। टामस फुलर अंतान अंतान दशन क एक मा कसौटी है। िशवानंद अंधकार मुझे अंधकार से काश क ओर ले चलो। बृहदारयक उपिनषद् अि अि वण को परखती है, संकट वीर पुष को। अात अछा वाय अछा वाय एवं अछी समझ जीवन के दो सवम वरदान ह। यूलयस साइरस अान अान से बढ़कर कोई अंधकार नह है। शेसिपयर अानी अानी का संग नह करना चािहए। आचारांग अित अित से अमृत भी िवष बन जाता है। लोकोि सभी वतुओं क अित दोष उप करती है। भवभूित अधक खाने से मनुय मशान जाता है। लोकोि अितथ अितथ का अितय करना े धम है। अवघोष अितथ सबके आदर का पा होता है। अात दर म दर वो है जो अितथ का सकार न करे। ितववर अयाचार अयाचार सदा ही दुबलता है। जेस रसेल लावेल अधक अधक का अधक फल होता है। अात अधकार अधकार जताने से अधकार स नह होता। रवीनाथ ठाकुर अधकार केवल एक है और वह है सेवा का अधकार, कतय पालन का अधकार। संपूणानंद अययन अययन उास का और योयता का कारण बनता है। बेकन अययन आनंद, अलंकार तथा योयता के लए उपयोगी है। बेकन अनंत जीवन अनंत जीवन का एकमा पाथेय है धम। रवनाथ ठाकुर अनुभव अनुभव को खरीदने क तुलना म उसे दूसर से माँग लेना अधक अछा है। चास कैलब काटन िबना अनुभव के कोरा शादक ान अंधा है। वामी िववेकानंद अनुशासन अनुशासन परकार क अि है, जससे ितभा योयता बन जाती है। अात अभय अभय ही है। बृहदारयक उपिनषद् अभाव अभाव म अभाव है-बुि का अभाव। दूसरे अभाव को संसार अभाव नह मानता। ितववर अिभमान अिभमान को जीत से नता जात् होती है। महावीर वामी शुभाथय को अिभमान नह होता। कहण अिभमान करना अानी का लण है। सूकृतांग अिभमानी िबना जाने हठ पूवक काय करनेवाला अिभमानी िवनाश को ा होता है। सोमदेव अयास कोई ऐसी वतु नह, है जो अयास करने पर भी दुकर हो। बोधचयावतार अथशा सचा अथशा तो याय बुि पर आधारत अथशा है। महामा गाँधी अवगुण अवगुण नाव क पदी के छेद के समान है, जो चाहे छोटा हो या बड़ा, एक िदन उसे डुबो देगा। कालदास पराय धन का अपरहण, परी के साथ संसग, सुद पर अित शंका- ये तीन दोष िवनाशकारी ह। वामीिक अवसर जो अवसर को समय पर पकड़ ले, वही सफल होता है। अवसर उनक मदद कभी नह करता जो अपनी मदद वयं नह करते। कहावत असंभव ‘असंभव’ एक शद है, जो मूख के शदकोश म पाया जाता है। नेपोलयन असमय असमय िकया हआ काय न िकया हआ जैसा ही है। अात अहंकार अहंकार छोड़े िबना सचा ेम नह िकया जा सकता। वामी िववेकानंद तलवार मारे एक बार, अहसान मारे बार-बार। लोकोि अिहंसा अिहंसा परम े मानव-धम है, पशु-बल से वह अनंत गुना महान् और उच है। महामा गाँधी आँख अकेली आँख ही बता सकती है िक दय म ेम है अथवा घृणा। ितववर आँसू जो और के लए रोते है, उनके आँसू भी हीर क चमक को हरा देते ह। रांगेय राघव आह वयं पर आह करो, अनुकरण मत करो। एमसन आचरण छोटी निदयाँ शोर करती ह और बड़ी निदयाँ शांत चुपचाप बहती ह। सुिनपात आचरण दपण के समान है, जसम हर मनुय अपना ितिबंब िदखाता है। आमिववास आमिववास सफलता का थम रहय है। एमसन आमसमान आमसमान रखना सफलता क सीढ़ी पर पग रखना है। अात आमा यह आमा है। बृहदारयकोपिनषद् मनुय क आमा उसके भाय से अधक बड़ी होती है। अरिवंद आमक शि आमक शि ही वातिवकता शि है। िशवानंद आदश आदश कभी नह मरते। भािगनी िनवेिदता आनंद आनंद का मूल है-संतोष। मनुमृित आनंद वह खुशी है जसके भोगन पर पछतावा नह होता। सुकरात पढ़कर आनंद के अितरेक से आँख यिद नीली न हो जाएँ तो वह कहानी कैसी ? शरचं आपदा-आप आपदा एक ऐसी वतु है जो हम अपने जीवन क गहराइय म अंति दान करती है। िववेकानंद आभूषण नारी का आभूषण शील और लजा है। बा आभूषण उसक शोभा नह बढा सकते ह। बृहकपभाय आय यय िविा, चतुराई और बुिमानी क बात यही है िक मनुय अपनी आय से कम यय करे। अात आरोय आरोय परम लाभ है, संतोष परम धन है, िववास परम बंधु है, िनवाण परम सुख है। धमपद धम, अथ, काम और मो का धान कारण आरोय है। चरक संिहता आलय br> आलय मनुय के शरीर म रहने वाला घोर शु है। भतृहर आलय दरता का मूल है। यजुवद आवयकता आवयकता अिवकार क जननी है। लोकोि आवयकता से अधक बोलना यथ है। तुकाराम असीम आवयकता नह, तृणा होती है। जैन अिवकार आिवकार से आिवकार का जम होता है। एमसन आशा आशा और आमिववास ही वे वतुएँ ह जो हमारी शिय को जात करती ह। वेट माडन यनशील मनुय के लए सदा आशा है। आसि िवषय के ित आसि मोह उतप करती है। भ
इंसान बन गया
एकलड़कािवदेशम धनकमाने गया...वहाँ से उसने अपनीमाँ कोअपनीिदनचया बताई... सुबहउठकरघरकसाफ़सफाई, िफरनान, िफरपूजापाठ, िफरनाताबनाना, िफर घरके सभीदरवाजे अछे से बंदकरके घरकोसुरितकरके, कामपरजाना, आते समय सजीभाजीकखरीदारी, घरआकरखानाबनाना, खाकरबतनसाफ़करना. िफरभु का नामलेकरसोजाना. माँ ने पुछा: बेटाघरके बाथमभीतुमसाफ़करते हो? बेटे ने कहाँ : हाँ माँ, माँ ने पुछा: बेटाझाड़ू-पछाभीसबतुहीकोकरनापड़ताह ? बेटे ने कहाँ : हाँ माँ, माँ ने पूछा: बेटाघरकसुरा, िहसाब-िकताब, िफरपूजापाठभीसबतू करताह ? बेटे ने कहाँ : हाँ माँ.....सबकुछम हीकरताहँ माँ ने कहाबेटातू तोअबइंसानहोगयारे. बेटे ने आचय से पूछा: इंसानबनगयामतलब? तबमाँ ने कहा: तू चारवणं के कामिबनािकसीसंकोचके वयं करताह...पंिडतकाभी... शुकाभी... वैयकाभीऔरियकाभी... मुझे गव ह कतू जाितवादऔरवणवादसेबहतऊपरउठकरअबइंसानबनगयाह













