गुरुवार, 14 नवंबर 2013

II Children's Day - 14th November II


Children's day, in hindi known as "Bal Diwas", in India falls on November 14th every year and for good reason. Children's day in India is celebrated on Pandit Nehru's birthday as a day of fun and frolic, a celebration of childhood, children and Nehruji's love for them.
About Jawahar Lal Nehru
On November14, 1889, a son was born to an eminent lawyer, Motilal Nehru and his wife Swaroop Rani at Allahabad. They named him Jawaharlal. He was a brilliant, kindhearted child who was greatly loved by all. 
His father wanted to give him the best education and hence sent him to England for his M.A. from Cambridge. The British ruled India at that time. When he returned to India, young Jawaharlal realized that he wanted to help the poor and the downtrodden. He took part in the Freedom Struggle of India and became a follower of Mahatma Gandhi who had just returned from South Africa at that time. When India gained its independence, he became the first Prime Minister of free India.
He was a perfect blend of eastern philosophical values and western scientific thinking and encouraged technological progress. But he was also a man of letters and a great poet and wrote some famous works like, ‘Glimpses of World History’ and ‘Discovery of India’. His letters to his daughter, Indira, were also compiled into a book and reflects his philosophical outlook, his compassion and above all, his tender heart.  
The Birth of Chacha Nehru

Chacha Nehru as the children fondly referred to him, was fond of both children and roses. In fact he often compared the two, saying that children were like the buds in a garden. They should be carefully and lovingly nurtured, as they were the future of the nation and the citizens of tomorrow. He felt that children are the real strength of a country and the very foundation of society. He was the ‘beloved’ of all the children who gave him the endearing name of ‘Chacha Nehru’.
Celebrations
As a tribute to this great man and his love for the children, his birthday is celebrated all over India as ‘CHILDREN’S DAY’. Most schools have cultural programmes for the day, with the students managing it all. All over the country, various cultural, social, and even corporate, institutions conduct competitions for children. Children's Day is a day for children to engage in fun and frolic. Schools celebrate this day by organizing cultural programmes. Teachers of the school perform songs and dances for their students.
Therefore, Children's Day is special. It is a day set aside to remember Pandit Nehru and his love for children.

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

प्राथमिक शिक्षक संगठन की चाटुकारिता !!!

प्राथमिक शिक्षक संगठन की चाटुकारिता !!!
बंधुओं १० तारीख को प्राथमिक शिक्षक संगठन का चुनाव सम्पन होगा | लेकिन मै एक बात कहना चाहता हूँ कि क्या इसी प्रकार चुनाव होता रहेगा कि संगठन प्राथमिक का और चुनाव जूनियर के शिक्षक लड़ते रहेगें जब कि जूनियर का शिक्षक संगठन अलग है वे लोग अपनए संगठन में क्यों सिरकत नहीं करना चाहते हैं क्यों उनका मोह प्राथमिक संगठन से है ? साथियों अगर आप चाहते हैं कि वे ही हमारा प्रतिनिधित्व करते रहे तो प्राथमिक शिक्षक संगठन को खत्म कर जूनियर शिक्षक संगठन में विलय कर देना चाहिए , फिर किसी प्रकार का द्वेष भाव नहीं रहेगा ,दोनों संगठनो को एक कर साथ अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए | लेकिन कतिपय जूनियर शिक्षक आज भी प्राथमिक प्राथमिक कि सदस्यता लिए हुए दोनों तरफ से राजनितिक रोठियाँ सेक रहे हैं |क्या यह सही है ,अगर यह सही है तो समस्त प्राथमिक शिक्षकों को त्याग पत्र दे देना चाहिए |और इस प्रकार के चुनाव में सिरकत नहीं करना चाहिए क्योकि समय के साथ अपने धन का दुरपयोग नहीं करना चाहिए |अगर आपको मेरी बात ठीक लगे तो बेबाक होकर अपना मत प्रस्तुत करें | इन्ही शब्दों के साथ जय प्राथमिक शिक्षक संगठन !!!!

रविवार, 22 सितंबर 2013

बेटी दिवस

 बेटे या बेटियां
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      बोए जाते है बेटे
    और उग आती हैं बेटियां

 खाद पानी बेटों में
और लहलहाती हैं बेटियां

एवेरेस्ट की ऊँचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे
और चढ़ जाती हैं बेटियां

                                                                                        रुलाते हैं बेटे
और रोती हैं बेटियां

        कई तरह गिरते और गिराते हैं बेटे
और संभाल लेती हैं बेटियां

सुख के स्वपन दिखाते हैं बेटे
जीवन का यथार्थ होती हैं बेटियां


जीवन तो बेटों का है
  और मारी जाती हैं बेटियां

बुधवार, 11 सितंबर 2013

shivam
shivam the great

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गुरुवार, 5 सितंबर 2013

शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस गुरु की महत्ता बताने वाला प्रमुख दिवस है। भारत में 'शिक्षक दिवस' प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को मनाया जाता है। शिक्षक का समाज में आदरणीय व सम्माननीय स्थान होता है। भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस और उनकी स्मृति के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला 'शिक्षक दिवस' एक पर्व की तरह है, जो शिक्षक समुदाय के मान-सम्मान को बढ़ाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार गुरु पूर्णिमा के दिन को 'गुरु दिवस' के रूप में स्वीकार किया गया है। विश्व के विभिन्न देश अलग-अलग तारीख़ों में 'शिक्षक दिवस' को मानते हैं। बहुत सारे कवियों, गद्यकारों ने कितने ही पन्ने गुरु की महिमा में रंग डाले हैं।

महत्त्व

गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पाय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।
कबीरदास द्वारा लिखी गई उक्त पंक्तियाँ जीवन में गुरु के महत्त्व को वर्णित करने के लिए काफी हैं। भारत में प्राचीन समय से ही गुरु व शिक्षक परंपरा चली आ रही है। गुरुओं की महिमा का वृत्तांत ग्रंथों में भी मिलता है। जीवन में माता-पिता का स्थान कभी कोई नहीं ले सकता, क्योंकि वे ही हमें इस रंगीन ख़ूबसूरत दुनिया में लाते हैं। उनका ऋण हम किसी भी रूप में उतार नहीं सकते, लेकिन जिस समाज में रहना है, उसके योग्य हमें केवल शिक्षक ही बनाते हैं। यद्यपि परिवार को बच्चे के प्रारंभिक विद्यालय का दर्जा दिया जाता है, लेकिन जीने का असली सलीका उसे शिक्षक ही सिखाता है। समाज के शिल्पकार कहे जाने वाले शिक्षकों का महत्त्व यहीं समाप्त नहीं होता, क्योंकि वह ना सिर्फ़ विद्यार्थी को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि उसके सफल जीवन की नींव भी उन्हीं के हाथों द्वारा रखी जाती है।

शिक्षक का मान-सम्मान

गुरु, शिक्षक, आचार्य, अध्यापक या टीचर ये सभी शब्द एक ऐसे व्यक्ति को व्याख्यातित करते हैं, जो सभी को ज्ञान देता है, सिखाता है। इन्हीं शिक्षकों को मान-सम्मान,
 आदर तथा धन्यवाद देने के लिए एक दिन निर्धारित है, जो की 5 सितंबर को 'शिक्षक दिवस' के रूप में जाना जाता है। सिर्फ़ धन को देकर ही शिक्षा हासिल नहीं होती, बल्कि अपने गुरु के प्रति आदर, सम्मान और विश्वास, ज्ञानार्जन में बहुत सहायक होता है।[1] 'शिक्षक दिवस' कहने-सुनने में तो बहुत अच्छा प्रतीत होता है, लेकिन क्या हम इसके महत्त्व को समझते हैं। शिक्षक दिवस का मतलब साल में एक दिन अपने शिक्षक को भेंट में दिया गया एक गुलाब का फूल या ‍कोई भी उपहार नहीं है और यह शिक्षक दिवस मनाने का सही तरीका भी नहीं है। यदि शिक्षक दिवस का सही महत्त्व समझना है तो सर्वप्रथम हमेशा इस बात को ध्यान में रखें कि आप एक छात्र हैं और ‍उम्र में अपने शिक्षक से काफ़ी छोटे है। और फिर हमारे संस्कार भी तो यही सिखाते है कि हमें अपने से बड़ों का आदर करना चाहिए। अपने गुरु का आदर-सत्कार करना चाहिए। हमें अपने गुरु की बात को ध्यान से सुनना और समझना चाहिए। अगर अपने क्रोध, ईर्ष्या को त्याग कर अपने अंदर संयम के बीज बोएं तो निश्‍चित ही हमारा व्यवहार हमें बहुत ऊँचाइयों तक ले जाएगा और तभी हमारा 'शिक्षक दिवस' मनाने का महत्त्व भी सार्थक होगा।[2]

प्रेरणा स्रोत

संत कबीर के शब्दों से भारतीय संस्कृति में गुरु के उच्च स्थान की झलक मिलती है। भारतीय बच्चे प्राचीन काल से ही आचार्य देवो भवः का बोध-वाक्य सुनकर ही बड़े होते हैं। माता-पिता के नाम के कुल की व्यवस्था तो सारे विश्व के मातृ या पितृ सत्तात्मक समाजों में चलती है, परन्तु गुरुकुल का विधान भारतीय संस्कृति की अनूठी विशेषता है। कच्चे घड़े की भांति स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को जिस रूप में ढालो, वे ढल जाते हैं। वे स्कूल में जो सीखते हैं या जैसा उन्हें सिखाया जाता है, वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनकी मानसिकता भी कुछ वैसी ही बन जाती है, जैसा वह अपने आस-पास होता देखते हैं। सफल जीवन के लिए शिक्षा बहुत उपयोगी है, जो गुरु द्वारा प्रदान की जाती है। गुरु का संबंध केवल शिक्षा से ही नहीं होता, बल्कि वह तो हर मोड़ पर अपने छात्र का हाथ थामने के लिए तैयार रहता है। उसे सही सुझाव देता है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

माली रूपी शिक्षक

शिक्षक उस माली के समान है, जो एक बगीचे को भिन्न-भिन्न रूप-रंग के फूलों से सजाता है। जो छात्रों को कांटों पर भी मुस्कुराकर चलने को प्रोत्साहित करता है। उन्हें जीने की वजह समझाता है। शिक्षक के लिए सभी छात्र समान होते हैं और वह सभी का कल्याण चाहता है। शिक्षक ही वह धुरी होता है, जो विद्यार्थी को सही-गलत व अच्छे-बुरे की पहचान करवाते हुए बच्चों की अंतर्निहित शक्तियों को विकसित करने की पृष्ठभूमि तैयार करता है। वह प्रेरणा की फुहारों से बालक रूपी मन को सींचकर उनकी नींव को मजबूत करता है तथा उसके सर्वांगीण विकास के लिए उनका मार्ग प्रशस्त करता है। किताबी ज्ञान के साथ नैतिक मूल्यों व संस्काररूपी शिक्षा के माध्यम से एक गुरु ही शिष्य में अच्छे चरित्र का निर्माण करता है। एक ऐसी परंपरा हमारी संस्कृति में थी, इसलिए कहा गया है कि-
"गुरु ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मैः श्री गुरुवेः नमः।"
कई ऋषि-मुनियों ने अपने गुरुओं से तपस्या की शिक्षा को पाकर जीवन को सार्थक बनाया। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना मानस गुरु मानकर उनकी प्रतिमा को अपने सक्षम रख धनुर्विद्या सीखी। यह उदाहरण प्रत्येक शिष्य के लिए प्रेरणादायक है।

गुरु-शिष्य परंपरा

गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है, जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन वर्तमान समय में कई ऐसे लोग भी हैं, जो अपने अनैतिक कारनामों और लालची स्वभाव के कारण इस परंपरा पर गहरा आघात कर रहे हैं। 'शिक्षा' जिसे अब एक व्यापार समझकर बेचा जाने लगा है, किसी भी बच्चे का एक मौलिक अधिकार है, लेकिन अपने लालच को शांत करने के लिए आज तमाम शिक्षक अपने ज्ञान की बोली लगाने लगे हैं। इतना ही नहीं वर्तमान हालात तो इससे भी बदतर हो गए हैं, क्योंकि शिक्षा की आड़ में कई शिक्षक अपने छात्रों का शारीरिक और मानसिक शोषण करने को अपना अधिकार ही मान बैठे हैं। किंतु कुछ ऐसे गुरु भी हैं, जिन्होंने हमेशा समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। प्राय: सख्त और अक्खड़ स्वभाव वाले यह शिक्षक अंदर से बेहद कोमल और उदार होते हैं। हो सकता है कि किसी छात्र के जीवन में कभी ना कभी एक ऐसे गुरु या शिक्षक का आगमन हुआ हो, जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी या फिर जीवन जीने का सही ढंग सिखाया हो।


  हे शिक्षक तुम्हें नमन

महान हो तुम, गुणवान हो तुम,
ज्ञान की सदा से खान हो तुम।

जल से निर्मल, पुष्प से कोमल,
शिष्यों के भाग्य विधाता हो तुम।

नदियों से पावन, पर्वत से ऊँचे,
सूरज जैसे तेजवान हो तुम।

सागर से गंभीर, हृदय से कोमल,
ज्ञान की गंगा और भंडार हो तुम।

इस जग में तुम सा कोई नहीं,
संपूर्णता का वरदान हो तुम।

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

रक्षाबंधन भाई बहनों का वह त्यौहार



भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े परिचायक हैं हमारे पर्व और त्यौहार. यहां हर महीने और हर मौसम में कोई ना कोई ऐसा त्यौहार होता ही है जिसमें देश की संस्कृति की झलक हमें देखने को मिलती है. त्यौहारों का यह देश अपनी विविधता में एकता के लिए ही विश्व भर में अपनी पहचान बनाए हुए है. आज हमारे देश का एक बहुत ही अहम त्यौहार है रक्षाबंधन.

रक्षाबंधन भाई बहनों का वह त्यौहार है तो मुख्यत: हिन्दुओं में प्रचलित है पर इसे भारत के सभी धर्मों के लोग समान उत्साह और भाव से मनाते हैं. पूरे भारत में इस दिन शमां देखने लायक होता है और हो भी क्यूं ना, यही तो एक ऐसा विशेष दिन है जो भाई-बहनों के लिए बना है. यूं तो भारत में भाई-बहनों के बीच प्रेम और कर्तव्य की भूमिका किसी एक दिन की मोहताज नहीं है पर रक्षाबंधन के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की वजह से ही यह दिन इतना महत्वपूर्ण बना है. बरसों से  चला आ रहा यह त्यौहार आज भी बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

हिन्‍दू श्रावण मास (जुलाई-अगस्‍त) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह त्‍यौहार भाई का बहन के प्रति प्‍यार का प्रतीक है. रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों की दाहिनी कलाई में राखी बांधती हैं, उनका तिलक करती हैं और उनसे अपनी रक्षा का संकल्प लेती हैं. हालांकि रक्षाबंधन की व्यापकता इससे भी कहीं ज्यादा है. राखी बांधना सिर्फ भाई-बहन के बीच का कार्यकलाप नहीं रह गया है. राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है. विश्वकवि रविंद्रनाथ ठाकुर ने इस पर्व पर बंग-भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था.

रक्षा बंधन का पौराणिक महत्व
रक्षा बंधन का इतिहास हिंदू पुराण कथाओं में है. वामनावतार नामक पौराणिक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है. कथा इस प्रकार है- राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार का प्रयत्‍‌न किया, तो देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की. विष्णु जी वामन ब्राह्मण बनकर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए. गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी. वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया. उसने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया. लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गई. नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बाधकर उसे अपना भाई बना लिया. बदले में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आई. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी.

महाभारत में राखी
महाभारत में भी रक्षाबंधन के पर्व का उल्लेख है. जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं, तब कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी. शिशुपाल का वध करते समय कृष्ण की तर्जनी में चोट आ गई, तो द्रौपदी ने लहू रोकने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर चीर उनकी उंगली पर बांध दी थी. यह भी श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था. कृष्ण ने चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर यह कर्ज चुकाया था. रक्षा बंधन के पर्व में परस्पर एक-दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना निहित है.

ऐतिहासिक महत्व
इतिहास में भी राखी के महत्व के अनेक उल्लेख मिलते हैं. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा-याचना की थी. हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी. कहते हैं, सिकंदर की पत्‍‌नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरु को राखी बांध कर उसे अपना भाई बनाया था और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया था. पुरु ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया था.
विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस पर्व पर बंग भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था. 1947 के भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में जन जागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया.

आज यह त्यौहार हमारी संस्कृति की पहचान है और हर भारतवासी को इस त्यौहार पर गर्व है. लेकिन भारत जहां बहनों के लिए इस विशेष पर्व को मनाया जाता है वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भाई की बहनों को गर्भ में ही मार देते हैं. आज कई भाइयों की कलाई पर राखी सिर्फ इसलिए नहीं बंध पाती क्यूंकि उनकी बहनों को उनके माता-पिता इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते हैं. यह बहुत ही शर्मनाक बात है कि देश में कन्या-पूजन का विधान शास्त्रों में है वहीं कन्या-भ्रूण हत्या के मामले सामने आते हैं. यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि बहनें हमारे जीवन में कितना महत्व रखती हैं. अगर हमने कन्या-भ्रूण हत्या पर जल्द ही काबू नहीं पाया तो मुमकिन है एक दिन देश में लिंगानुपात और तेजी से घटेगा और सामाजिक असंतुलन भी. भाई-बहनों के इस त्यौहार को जिंदा रखने के लिए जरूरी है कि हम सब मिलकर कन्या-भ्रूण हत्या का विरोध करें और महिलाओं पर हो रहे शोषण का विरोध करें. अक्सर लोग यह भूल जाते हैं कि राह चलते वह जिस महिला या लड़की पर फब्तियां कस रहे हैं वह भी किसी की बहन होगी और जो वह दूसरों की बहन के साथ कर रहे हैं वह कोई उनकी बहन के साथ भी कर सकता है.


हम आशा करते हैं कि रक्षाबंधन का यह त्यौहार हमेशा इसी हर्षोल्लास के साथ मनाए जाएगा और देश की संस्कृति में यह त्यौहार इसी तरह नगीने की तरह चमकता रहेगा.

बुधवार, 14 अगस्त 2013

15 अगस्त सन् 1947




15 अगस्त सन् 1947


हम स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं और आज 15 अगस्त 2013 को अपनी स्वतंत्रता की 66वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी हमारे प्रधानमंत्री लालकिला पर झंडा फहराएंगे। देशवासियों को भविष्य के लिए तरह तरह के सुखद सपने दिखाएंगे और यह भी बताएंगे कि हमें यह स्वतंत्रता, कितनी कुर्बानियों, कितने आंदोलनों और कितने सारे संघर्षों के बाद मिली है। मगर काश हमारे माननीय प्रधानमंत्री यह भी बता पाते कि हमें जो यह स्वतंत्रता मिली है, हमारी हुकूमत ने इसकी कौन सी परिभाषा निर्धारित की है? और जो परिभाषा हमें इन 66 वर्षों में समझ में आई है, क्या स्वतंत्रता की सही परिभाषा यही है? हम जानना चाहते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त होने के बाद से ही हम क्यों अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी रहन सहन और अंग्रेजी संस्कृति के गुलाम होते चले गए?
इस संदर्भ में हजारीबाग के नाट्यकर्मी स्व. निशिकांत द्वारा लिखित एवं प्रदर्शित एक एकांकी अंग्रेजों भारत छोड़ो के एक दृश्य की याद आ रही है। यह नाटक ब्रिटिश हुकूमत काल को संबोधित नहीं बल्कि आजाद भारत की सांस्कृतिक दु: परिस्थितियों के संदर्भ हैं, जिसमें एक संवाद है, अंग्रेज चले गए तो क्या हुआ। हमारा देश स्वतंत्र कहां हुआ? हम उनकी भाषाई, सांस्कृतिक और मानसिक गुलामी में जकड़े हुए तो हैं ही। यार, जब हमारा देश अंग्रेजों के चंगुल में था, उनकी तमाम 'यादतियों के बावजूद, हमारी भाषा, हमारा रहन-सहन, हमारी सांस्कृतिक विरासत, हमारे नृत्य, संगीत, सबकुछ हमारे साथ थे, पर अंग्रेज क्या गये, सब कुछ हमसे लूट कर ले गए। कहां हैं हमारी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत? नृत्य के नाम पर डिस्को, बाल डांस, संगीत के नाम पर पॉप, पाश्चात्य संगीत और चप्पे-चप्पे पर छाए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल बाबूजी, पापा डैडी हो गए, मां मॉम, मम्मी। अब बताओ, हम कहां रहे, अंग्रेज हो गए या नहीं? 
फिर भी इन सब के बावजूद हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। हमारा अपना संविधान और कानून है। हमारे अपने मौलिक अधिकार हैं। आजादी के बाद हमारे देश ने बेइंतहा तरक्की कर ली है। आर्थिक तौर पर तो इतनी अधिक कि हमारे देश के धन विदेशों की बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। यह दीगर बात है कि कर्ज के बोझ से दबकर किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है। महंगाई से आम आदमी की दाल रोटी पर आफत है। दाल रोटी तो दूर घर में चूल्हा जलाना भी दुश्वार हैं। उग्रवाद आतंकवाद अपने चरम पर हैं और भ्रष्टाचार, जमाखोरी, लाखों लाख करोड़ के घोटाले अपनी पराकाष्ठा पर है। 
फिर भी हमें इस बात का संतोष होना चाहिए कि हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। और यह स्वतंत्रता हमें लाठी-गोली खाकर, शहीदों की कुर्बानियों और विभिन्न आंदोलनों की बदौलत मिली है। और जब हमें आजादी मिल ही चुकी है, तो फिर अब भला जनहित के लिए किसी भी तरह के आंदोलन की क्या जरूरत? अब तो हमारे देश में एक अपनी सरकार भी है। जनता के द्वारा, जनता की, जनता के लिए चुनी हुई सरकार। जब हमारी अपनी ऐसी सरकार है ही, तो जनहित की बात तो वही सोचेगी। मगर हमारे देश का दुर्भाग्य कि कुछ लोग ऐसे भी है। जिन पर आज भी आंदोलनों का भूत सवार है। जनहित और देश में व्याप्त असंगतियों, अनैतिकता आदि के विरुद्ध आंदोलनों का भूत। उनका मानना है कि हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इन्हीं आंदोलनों के बल पर भारत को ब्रिटिश हुकूमत के चंगुल से मुक्त कराकर अंग्रेजों को देश से भागने पर मजबूर कर दिया था। फिर उनके आंदोलन सफल क्यों नहीं होंगे? पर काश वे सोच और समझ पाते कि जयप्रकाश आंदोलन का क्या हश्र हुआ? आपातकाल नामक जनरल डायर ने कैसा कहर बरपाया आंदोलन से इतनी सफलता जरूर मिली कि देश में जनता पार्टी को सत्ता मिल गई और इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता'युत हो गई। यानी सत्ता परिवर्तन तो जरूर हुआ। मगर व्यवस्था परिवर्तन? और व्यवस्था परिवर्तन होता भी तो कैसे? सत्ता से 'युत में सिर्फ इंदिरा गांधी हुई थी, कांग्रेस थोड़े ही। मंजे हुए कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई जनता पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्री बने और बाबू जगजीवन राम जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं का सरकार में वर्चस्व रहा। हश्र यह हुआ कि जनता पार्टी का शासन सिर्फ जनवरी 1977 से जनवरी 1980 तक रहा। इसके बाद सत्ता पुन: इंदिरा गांधी के हाथ में। फिर उसके बाद का किस्सा तो सबको पता ही है। 
ऐसे में आंदोलनकारियों को सोचना तो चाहिए ही कि ऐसे आंदोलनों का भला क्या फायदा। जबकि हाल ही में बाबा रामदेव का हश्र वे देख चुके हैं। और प्रणव मुखर्जी ने यह धमकी भी दे रखी है कि अभी जो देश के हालात हैं, वे पूरी तरह आपातकाल जैसे ही हैं। लेकिन आंदोलनकारी तो आंदोलनकारी ही ठहरे। अब देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, विदेशों में जमा लाखों करोड़ का काला धन आदि जैसे मुद्दे हों, आम जनता भूख से कुलबुला रही हो, तो भला आंदोलनकारी चुप कैसे रह सकते हैं। आंदोलन का भूत होना ही ऐसा है कि लाठी-गोली या फांसी भी उस भूत के सामने नगण्य हो जाते हैं। अब राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव को ही ले लीजिए। तीनों के लिए फांसी का फंदा तैयार हो चुका था। पर फांसी से तीन दिन पहले, यानी 20 मार्च 1931 को तीनों ने एक मर्सी पिटिशन तैयार कर लाहौर सेंट्रल जेल के अधीक्षक के माध्यम से पंजाब के गर्वनर को भिजवाया था, जिसमें तीनों ने एक लंबे पत्र के साथ दया की प्रार्थना इस प्रकार की थी - फांसी मत दो, हमें गोली से उड़ा दो। इस मर्सी पिटिशन को जनसत्ता ने 24 मार्च 1885 को अपने रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित किया था।
मर्सी पिटिशन के कुछ छिटपुट अंश :
1. हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठी भर शक्तिशाली लोगों ने मेहनत मजदूरी करने वाले भारतीयों और जन साधारण के प्राकृतिक साधनों पर अधिकार जमा रखा है। ऐसे स्वार्थ साधने वाले, चाहे अंग्रेज पूंजीपति हों अथवा हिंदुस्तानी ((अर्थात भगत सिंह को यह आभास था कि भारत को सिर्फ अंग्रेजों से मुक्त करा लेना ही स्वतंत्रता नहीं होगा, बल्कि सही अर्थों में स्वतंत्रता तब मिलेगी, जब अवाम को भारतीय चाटुकारों से भी मुक्ति मिलेगी।)) 

2. युद्ध तब तक जारी रहेगा, जब तक वर्तमान समाज के स्थान पर नए सिरे से समाज का ऐसा पुनर्गठन न हो जाए, जिसमें स्वार्थियों के स्वार्थ सधने बंद न हो जाएं और समाज तथा मानव जाति को स'ची शांति मिल सके। 

3. हमने इस युद्ध में खुलकर भाग लिया है और हमें गर्व हैं। हमने इस युद्ध को न ही आरंभ किया है और न हमारे जीवन के साथ यह समाप्त ही होगा। इसकी शुरूआत तो ऐतिहासिक घटनाओं और वर्तमान समाज की असंगतियों के परिणामस्वरूप हुई है। 

4. आपने जब हमें फांसी पर लटकाने का निर्णय ले ही लिया है तो आप वैसा ही करेंगे। आपके हाथ में ताकत है और आपको अधिकार भी प्राप्त है। लेकिन हम यह भी कहना चाहते हैं कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस के अनुसार ही आप काम कर रहे हैं। इस कथन को सिद्ध करने के लिए आप काम कर रहे हैं। इस कथन को सिद्ध करने के लिए हमारे केस की कार्रवाई ही काफी है। हम युद्धबंदी हैं, अर्थात् हमारा दावा है कि हमें फांसी न देकर गोली से उड़ा दिया जाए। 

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने यह तो स्वीकार किया ही था कि भैंस उसी की होती है, जिसकी लाठी होती है। उन दिनों लाठी ब्रिटिश हुकूमत के हाथ में थी और आज हमारी अपनी सरकार के हाथ में। ऐसे में भैंस तो उसी की होगी। पर अन्ना जी और रामदेव बाबा को यह कौन समझाए। रामदेव बाबा का हश्र तो सब देख ही चुके हैं। फिर भी यदि अन्ना हजारे या अन्य आंदोलनकारी इससे सीख नहीं लेते, तो जाने वे और उनका मिजाज। हम तो बस इसी से संतुष्ट हैं कि हम अब स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। इसलिए हम तो चले लाल किला की ओर, जहां से हमारे माननीय प्रधानमंत्री हमारे सुखद भविष्य की कामना करते हुए जनहित के नए नए वायदे परोसेंगे। 

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

मलेथा की गूल

मलेथा... गाँव ..... जी हाँ इस हरियाली को वीर भड़ माधो सिंह भंडारी ने....... अपने छोटे से बेटे के खून से सिंचा है उनके पुत्र के इस बलिदान को समस्त उत्तराखंड का नमन.... "क्या च भंडारी तेरा मलेथा...कनडाली को खाणु तेरा मलेथा झंगोरा को खाणु तेरा मलेथा"""" यही शब्द थे जो गाथा नायक माधो सिंह भंडारी जी को मलेथा की
सारी में पानी लेन के लिए मजबूर
किया था और ये
शब्द उनकी प्रेमिका उदीना ने उनके लिए कहे थे
गाथा नायक माधो सिंह भंडारी जी ने मलेथा की कूल बनने के बाद
कहा था
की
""" ढल कदी कूल मेरा मलेथा,पलिंगा कु बाड़ी मेरा मलेथा गाउ मुड़े
धारी मेरा मलेथा,
छोलिंग बिजोरा मेरा मलेथा,गायो कु गुठार मेरा मलेथा,बैखू की ढसक
मेरा मलेथा
" ये जा उदीना मेरा मलेथा
लेकिन माँ की ममता को कोई नहीं जन सकता है ,,, जब माधो सिंह अपने बेटे की बलि देने को तयार होता है तो गजे सिंह यानि माधो सिंह भंडारी का बेटा अपनी माँ से इस प्रकार बोलता है .

गाजे सिंह :-बाबा जी बोना छन मेरा, पानी ओन मलेथा का सेरा, मेरी माँ जी में जणू पड़गी !
उदीना :- त्वे बिना कन्केक रोलु , मेरी काकी पर अभ कु सेलु !
गाजे सिंह :छेन्दा माँ बलिदान होण , मलेथा माँ पाणी ओण ,मेरी माँ जी में जणू पड़गी !
उदीना :तन न बोल ये मेरा बीर -मेरी जोंदी जुकड़ी न चीर,

इतिहास बताता है की . आज भी गढ़वाल की धरती को उदीना का सराफ मिला है.
माधो सिंह भंडारी के बाद गढ़वाल में ऐसा भड (बीर) पुरुष पैदा नहीं हुआ.

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

श्री देव सुमन

                                                           श्री देव सुमन 



यह वीर है उस पुण्य भूमि का, जिसको मानसखंड , केदारखंड, उत्तराखंड कहा जाता है, स्वतंत्रता संग्रामी श्री देब सुमन किसी परिचय के मोहताज़ नही हैं, पर आज की नई पीड़ी को उनके बारे में, उनके अमर बलिदान के बारे में पता होना चाहिए, जिससे उन्हें फक्र हो इस बात पर की हमारी देवभूमि में सुमन सरीखे देशभक्त हुए हैं।
सुमन जी का जनम १५ मई १९१५ या १६ में टिहरी के पट्टी बमुंड, जौल्ली गाँव में हुआ था, जो ऋषिकेश से कुछ दूरी पर स्थित है। पिता का नाम श्री हरी दत्त बडोनी और माँ का नाम श्रीमती तारा देवी था, उनके पिता इलाके के प्रख्यात वैद्य थे। सुमन का असली नाम श्री दत्त बडोनी था। बाद में सुमन के नाम से विख्यात हुए। पर्ख्यात गाँधी- वादी नेता, हमेशा सत्याग्रह के सिधान्तों पर चले। पूरे भारत एकजुट होकर स्वतंत्रता की लडाई लड़ रहा था, उस लडाई को लोग दो तरह से लड़ रहे थे कुछ लोग क्रांतिकारी थे, तो कुछ अहिंसा के मानकों पर चलकर लडाई में बाद चढ़ कर भाग ले रहे थे, सुमन ने भी गाँधी के सिधान्तों पर आकर लडाई में बद्चाद कर भाग लिया। सुन्दरलाल बहुगुणा उनके साथी रहे हैं जो स्वयं भी गाँधी वादी हैं।


परजातंत्र का जमाना था, लोग बाहरी दुश्मन को भागने के लिए तैयार तो हो गए थे पर भीतरी जुल्मो से लड़ने
की उस समय कम ही लोग सोच रहे थे और कुछ लोग थे जो पूरी तरह से आजादी के दीवाने थे, शायद वही थे सुमन जी, जो अंग्रेजों को भागने के लिए लड़ ही रहे थे साथ ही साथ उस भीतरी दुश्मन से भी लड़ रहे थे। भीतरी दुश्मन से मेरा तात्पर्य है उस समय के क्रूर राजा महाराजा। टिहरी भी एक रियासत थी, और बोलंदा बद्री (बोलते हुए बद्री नाथ जी) कहा जाता था राजा को। श्रीदेव सुमन ने मांगे राजा के सामनेरखी, और राजा ने ३० दिसम्बर १९४३ को उन्हें गिरफ्तार कर दिया विद्रोही मान कर, जेल में सुमन को भरी बेडियाँ पहनाई गई, और उन्हें कंकड़ मिली दाल और रेत मिले हुए आते की रोटियां दी गई, सुमन ३ मई १९४४ से आमरण अन्न शन शुरू कर दिया, जेल में उन्हें कई अमानवीय पीडाओं से गुजरना पड़ा, और आखिरकार जेल में २०९ दिनों की कैद में रहते हुए और ८४ दिनों तक अन्न शन पर रहते हुए २५ जुलाई १९४४ कोउन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी लाश का अन्तिम संस्कार न करके भागीरथी नदी में बहा दिया । मोहन सिंह दरोगा ने उनको कई पीडाएं कष्ट दिए उनकी हड़ताल को ख़त्म करने के लिए कई बार पर्यास किया पर सफल नही हुआ। 



कहते हैं समय के आगे किसी की नही चलती वही भी हुआ, सुमन की कुछ मांगे राजा ने नही मानी, सुमन जो जनता के हक के लिए लड़ रहे थे राजा ने ध्यान नही दिया, आज न राजा का महल रहा,न राजा के पास सिंहासन। और वह टिहरी नगरी आज पानी में समां गई है। पर हमेशा याद रहेगा वह बलिदान और हमेशा याद आयेगा क्रूर राजा। 
सुमन को कुछ लोग कहते हैं की उनकी लडाई केवल टिहरी रियासत के लिए थी, पर गवाह है सेंट्रल जेल आगरा से लिखी उनकी कुछ पंक्तियाँ की वह देश की आज़ादी के लिए भी लड़ रहे थे।
"आज जननी उगलती है अगनियुक्त अंगार माँ जी,
आज जननी कर रही है रक्त का श्रृंगार माँ जी। 
इधर मेरे मुल्क में स्वधीनता संग्राम माँ जी,
उधर दुनिया में मची है मार काट महान माँ जी। "
उनकी शहादत को एक कवि ने श्रधान्जली दी है-
"हुवा अंत पचीस जुलाई सन चौवालीस में तैसा, निशा निमंत्रण की बेला में महाप्राण का कैसा?
मृत्यु सूचना गुप्त राखी शव कम्बल में लिपटाया, बोरी में रख बाँध उसको कन्धा बोझ बनाया। 
घोर निशा में चुपके चुपके दो जन उसे उठाये, भिलंगना में फेंके छाप से छिपते वापस आए।"
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने सुमन जी को याद करते हुए लिखा था-
"मै हिमालयन राज्य परिषद् के प्रतिनिधि के रूप में सेवाग्राम में गाँधी जी से १५ मिनट तक बात करते हुए उनसे मिला था, उनकी असामयिक मृत्यु टिहरी के लिए कलंक है। "
और सुंदर लाल बहुगुणा जी ने कहा-
"सुमन मरा नही मारा गया, मेने उसे घुलते-घुलते मरते देखा था। सुमन ने गीता पड़ने को मांगी थी पर नही दी गई, मरने पर सुमन का शव एक डंडे से लटकाया गया, और उसी तरह नदी में विसर्जित कर दिया गया।" 
परिपूर्ण नन्द पेन्यूली ने कहा था-
"रजा को मालिक और स्वयं को गुलाम कहना उन्हें अच्छा नही लगा, जबकि राजा और प्रजा में पिता पुत्र का सम्बन्ध होता है।"
अपनी पत्नी विनय लक्ष्मी को उन्होंने कनखल से पत्र लिखा-
" माँ से कहना मुझे उनके लिए छोड़ दें जिनका कोई बेटा नही।" 
और साथ में खर्चे की कमी के लिए उन्होंने लिखा- 
"राह अब है ख़ुद बनानी, कष्ट, कठिनाइयों में धेर्य ही है बुद्धिमानी"