15 अगस्त सन् 1947
हम स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं और आज 15 अगस्त 2013 को अपनी स्वतंत्रता की 66वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। प्रत्येक वर्ष की
तरह इस बार भी हमारे प्रधानमंत्री लालकिला पर झंडा फहराएंगे। देशवासियों को भविष्य
के लिए तरह तरह के सुखद सपने दिखाएंगे और यह भी बताएंगे कि हमें यह स्वतंत्रता, कितनी कुर्बानियों, कितने
आंदोलनों और कितने सारे संघर्षों के बाद मिली है। मगर काश हमारे माननीय
प्रधानमंत्री यह भी बता पाते कि हमें जो यह स्वतंत्रता मिली है, हमारी हुकूमत ने इसकी कौन सी परिभाषा निर्धारित की
है? और जो परिभाषा हमें इन 66 वर्षों में समझ में आई है, क्या स्वतंत्रता की सही परिभाषा यही है? हम जानना चाहते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त
होने के बाद से ही हम क्यों अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी रहन सहन और
अंग्रेजी संस्कृति के गुलाम होते चले गए?
इस संदर्भ में हजारीबाग के नाट्यकर्मी स्व. निशिकांत
द्वारा लिखित एवं प्रदर्शित एक एकांकी अंग्रेजों भारत छोड़ो के एक दृश्य की याद आ
रही है। यह नाटक ब्रिटिश हुकूमत काल को संबोधित नहीं बल्कि आजाद भारत की
सांस्कृतिक दु: परिस्थितियों के संदर्भ हैं, जिसमें एक संवाद है, अंग्रेज चले गए तो क्या हुआ। हमारा देश स्वतंत्र
कहां हुआ? हम उनकी भाषाई, सांस्कृतिक और मानसिक गुलामी में जकड़े हुए तो हैं
ही। यार, जब हमारा देश अंग्रेजों के
चंगुल में था, उनकी तमाम 'यादतियों के बावजूद, हमारी भाषा, हमारा रहन-सहन, हमारी
सांस्कृतिक विरासत, हमारे नृत्य, संगीत, सबकुछ हमारे साथ थे, पर अंग्रेज क्या गये, सब
कुछ हमसे लूट कर ले गए। कहां हैं हमारी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत? नृत्य के नाम पर डिस्को, बाल डांस, संगीत के नाम पर पॉप, पाश्चात्य संगीत और चप्पे-चप्पे पर छाए अंग्रेजी
माध्यम के स्कूल बाबूजी, पापा डैडी हो गए, मां मॉम, मम्मी। अब बताओ, हम कहां रहे, अंग्रेज हो गए या नहीं?
फिर भी इन सब के बावजूद हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र
नागरिक हैं। हमारा अपना संविधान और कानून है। हमारे अपने मौलिक अधिकार हैं। आजादी
के बाद हमारे देश ने बेइंतहा तरक्की कर ली है। आर्थिक तौर पर तो इतनी अधिक कि
हमारे देश के धन विदेशों की बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। यह दीगर बात है कि कर्ज
के बोझ से दबकर किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढ़ती
ही जा रही है। महंगाई से आम आदमी की दाल रोटी पर आफत है। दाल रोटी तो दूर घर में
चूल्हा जलाना भी दुश्वार हैं। उग्रवाद आतंकवाद अपने चरम पर हैं और भ्रष्टाचार, जमाखोरी, लाखों लाख करोड़ के घोटाले
अपनी पराकाष्ठा पर है।
फिर भी हमें इस बात का संतोष होना चाहिए कि हम
स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। और यह स्वतंत्रता हमें लाठी-गोली खाकर, शहीदों की कुर्बानियों और विभिन्न आंदोलनों की
बदौलत मिली है। और जब हमें आजादी मिल ही चुकी है, तो
फिर अब भला जनहित के लिए किसी भी तरह के आंदोलन की क्या जरूरत? अब तो हमारे देश में एक अपनी सरकार भी है। जनता के
द्वारा, जनता की, जनता के लिए चुनी हुई सरकार। जब हमारी अपनी ऐसी
सरकार है ही, तो जनहित की बात तो वही
सोचेगी। मगर हमारे देश का दुर्भाग्य कि कुछ लोग ऐसे भी है। जिन पर आज भी आंदोलनों
का भूत सवार है। जनहित और देश में व्याप्त असंगतियों, अनैतिकता आदि के विरुद्ध आंदोलनों का भूत। उनका
मानना है कि हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इन्हीं आंदोलनों के बल पर भारत को
ब्रिटिश हुकूमत के चंगुल से मुक्त कराकर अंग्रेजों को देश से भागने पर मजबूर कर
दिया था। फिर उनके आंदोलन सफल क्यों नहीं होंगे? पर
काश वे सोच और समझ पाते कि जयप्रकाश आंदोलन का क्या हश्र हुआ? आपातकाल नामक जनरल डायर ने कैसा कहर बरपाया आंदोलन
से इतनी सफलता जरूर मिली कि देश में जनता पार्टी को सत्ता मिल गई और इंदिरा गांधी
की सरकार सत्ता'युत हो गई। यानी सत्ता परिवर्तन तो जरूर हुआ। मगर
व्यवस्था परिवर्तन? और व्यवस्था परिवर्तन होता
भी तो कैसे? सत्ता से 'युत में सिर्फ इंदिरा गांधी हुई थी, कांग्रेस थोड़े ही। मंजे हुए कांग्रेसी नेता
मोरारजी देसाई जनता पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्री बने और बाबू जगजीवन राम जैसे
दिग्गज कांग्रेसी नेताओं का सरकार में वर्चस्व रहा। हश्र यह हुआ कि जनता पार्टी का
शासन सिर्फ जनवरी 1977 से जनवरी 1980 तक रहा। इसके बाद सत्ता पुन: इंदिरा गांधी के हाथ
में। फिर उसके बाद का किस्सा तो सबको पता ही है।
ऐसे में आंदोलनकारियों को सोचना तो चाहिए ही कि ऐसे
आंदोलनों का भला क्या फायदा। जबकि हाल ही में बाबा रामदेव का हश्र वे देख चुके
हैं। और प्रणव मुखर्जी ने यह धमकी भी दे रखी है कि अभी जो देश के हालात हैं, वे पूरी तरह आपातकाल जैसे ही हैं। लेकिन आंदोलनकारी
तो आंदोलनकारी ही ठहरे। अब देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, विदेशों में जमा लाखों करोड़ का काला धन आदि जैसे
मुद्दे हों, आम जनता भूख से कुलबुला रही
हो, तो भला आंदोलनकारी चुप कैसे रह सकते हैं। आंदोलन का
भूत होना ही ऐसा है कि लाठी-गोली या फांसी भी उस भूत के सामने नगण्य हो जाते हैं।
अब राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव को ही
ले लीजिए। तीनों के लिए फांसी का फंदा तैयार हो चुका था। पर फांसी से तीन दिन पहले, यानी 20 मार्च 1931 को तीनों ने एक मर्सी पिटिशन तैयार कर लाहौर
सेंट्रल जेल के अधीक्षक के माध्यम से पंजाब के गर्वनर को भिजवाया था, जिसमें तीनों ने एक लंबे पत्र के साथ दया की
प्रार्थना इस प्रकार की थी - फांसी मत दो, हमें गोली से उड़ा दो। इस
मर्सी पिटिशन को जनसत्ता ने 24 मार्च 1885 को अपने रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित किया था।
मर्सी पिटिशन के कुछ छिटपुट अंश :
1. हम
यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठी भर
शक्तिशाली लोगों ने मेहनत मजदूरी करने वाले भारतीयों और जन साधारण के प्राकृतिक
साधनों पर अधिकार जमा रखा है। ऐसे स्वार्थ साधने वाले, चाहे अंग्रेज पूंजीपति हों अथवा हिंदुस्तानी
((अर्थात भगत सिंह को यह आभास था कि भारत को सिर्फ अंग्रेजों से मुक्त करा लेना ही
स्वतंत्रता नहीं होगा, बल्कि सही अर्थों में
स्वतंत्रता तब मिलेगी, जब अवाम को भारतीय चाटुकारों
से भी मुक्ति मिलेगी।))
2. युद्ध
तब तक जारी रहेगा, जब तक वर्तमान समाज के
स्थान पर नए सिरे से समाज का ऐसा पुनर्गठन न हो जाए, जिसमें
स्वार्थियों के स्वार्थ सधने बंद न हो जाएं और समाज तथा मानव जाति को स'ची शांति मिल सके।
3. हमने
इस युद्ध में खुलकर भाग लिया है और हमें गर्व हैं। हमने इस युद्ध को न ही आरंभ
किया है और न हमारे जीवन के साथ यह समाप्त ही होगा। इसकी शुरूआत तो ऐतिहासिक
घटनाओं और वर्तमान समाज की असंगतियों के परिणामस्वरूप हुई है।
4. आपने
जब हमें फांसी पर लटकाने का निर्णय ले ही लिया है तो आप वैसा ही करेंगे। आपके हाथ
में ताकत है और आपको अधिकार भी प्राप्त है। लेकिन हम यह भी कहना चाहते हैं कि
जिसकी लाठी, उसकी भैंस के अनुसार ही आप
काम कर रहे हैं। इस कथन को सिद्ध करने के लिए आप काम कर रहे हैं। इस कथन को सिद्ध
करने के लिए हमारे केस की कार्रवाई ही काफी है। हम युद्धबंदी हैं, अर्थात् हमारा दावा है कि हमें फांसी न देकर गोली
से उड़ा दिया जाए।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने यह तो
स्वीकार किया ही था कि भैंस उसी की होती है, जिसकी लाठी होती है। उन
दिनों लाठी ब्रिटिश हुकूमत के हाथ में थी और आज हमारी अपनी सरकार के हाथ में। ऐसे
में भैंस तो उसी की होगी। पर अन्ना जी और रामदेव बाबा को यह कौन समझाए। रामदेव
बाबा का हश्र तो सब देख ही चुके हैं। फिर भी यदि अन्ना हजारे या अन्य आंदोलनकारी
इससे सीख नहीं लेते, तो जाने वे और उनका मिजाज।
हम तो बस इसी से संतुष्ट हैं कि हम अब स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। इसलिए
हम तो चले लाल किला की ओर, जहां से हमारे माननीय
प्रधानमंत्री हमारे सुखद भविष्य की कामना करते हुए जनहित के नए नए वायदे परोसेंगे।