बुधवार, 24 अगस्त 2016

मसाण गढ़वाली कथा

             मसाण (गढ़वाली कथा)
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गढ़वाल के हजारों-लाखों पहाड़ों में से एक ऊंचे पहाड़ पर बसा एक सुंदर सा गांव था। चारों ओर से बांज-बुरांश-चीड़-पैंया जैसे पेड़ों से लकदक जंगल से घिरा जहाँ दोपहरी में भी सांय-सांय चलती हवा जंगल के जीवित होने अथवा किसी अलौकिक शक्ति के निवास होने का भ्रम पैदा करती थी। सामने देखो तो हिमाच्छादित चोटियां जो प्रभात के सूर्य के सारथि अरुण के रंग में रंगी स्वर्णिम आभा पैदा करती थी।
नीचे कलकल करती पहाड़ी नदी जो बलखाते सफ़ेद पानी की बौछारों में सबको अपने में डुबा लेना चाहती थी। जंगलों में भांति भांति के पक्षी अपनी साथिनों को रिझाने के लिए न केवल रंगीन पंखों से रिझाने वाला नृत्य करते बल्कि एक सुरीली तान छेड़ते जो नए-नए यौवन का साक्षात्कार करती तरुणियों में "खुदेड़" माहोल का सृजन करती। पहाड़ों में घास काटती "घस्यारियों" के अपने मायके की याद में गाए जाने वाले गीत उनके दिलों में भावी ससुराल के कष्टों का संकेत देते लगते।

पर लड़कों के साथ ऐसा नहीं था। उनकी नियति थी बड़े होकर "देस" जाकर रोजी कमाना। जैसे ही उनकी तरुणाई उनकी नाक के नीचे उभरने लगती, गाँव के लोग उनके देस भेजने की तैयारी करने लगते। कोई बड़े भाई के साथ, कोई चाचा के साथ, कोई पिता के साथ ही।

गांव में रह जाते बूढ़े, बालक और बिरह की मारी स्त्रियां जो अपने साजन का इंतजार सालों-साल तक करती। साथ ही वे नवयौनाएं भी जिनकी कुछ ही समय में शादी होने वाली हों। अपनी भाभियों के बिरह गीतों से वे अपने भविष्य की आहट पातीं।

उन्ही नवयौनाओं में एक है रुपसा। एक दम परी सी। गोरी इतनी कि अगर दूध पिए तो गले से दूध पेट की ओर जाता दिखे। उन्नत भाल किसी चित्र में बने नैनों के ऊपर  विराजमान नन्ही श्वेदबूंदों से भीगा जैसे ओंस की बूंदे अपने को धन्य कर रही हों। सुंदर दन्त-पंक्तियों से सजा मुख ऐसा कि जो बन्द होते हुए भी बात करने का आभास दिलाए। उस पर नव यौवन। मनुष्य तो क्या देवता भी ऐसे रूप से सम्मोहित हो जाएं।

इसीलिए नाम था रुपसा।

पहाड़ की परेशानियां भी पहाड़ से कम नहीं। किसी माता-पिता के लिए बेटी का होना, पराया धन होना होता, उस पर इतनी सुंदर कन्या का जितना शीघ्र हो उतना व्याह कर देना ही उचित होता है। शीघ्र ही दूर गांव के एक लड़के से बात पक्की हो गई। लड़का देश में रहता है और खूब कमाता है। पिता बड़ा लालची है पर अधिक वधूमूल्य देने को तैयार।

जी हाँ। वधूमूल्य। अनेक कुरीतियों में से यह भी एक पहाड़ी कुरीति थी। जितनी योग्य कन्या, उतना अधिक वधूमूल्य। या यूँ कहें जितना अयोग्य वर, उतना अधिक वधूमूल्य। बिलकुल आजकी दहेज प्रथा जैसा। पर एकदम उलट। जो देस से और कई अन्य कुरीतियों के साथ पहाड़ में आ चुकी है।

खैर यह विषय हमारी कथा का है ही नहीं। रुपसा की शादी का दिन तय हुआ। पंडित जी बोले कि मुहूर्त शीघ्र ही है। पर इतनी जल्दी लड़के को देश से बुलाया नहीं जा सकता। पर घड़े जे साथ फेरे हो सकते हैं। वर बाद में घर आ जाएगा।

तय दिन पर व्याह संपन्न हुआ।बिना वर के। रुपसा दुल्हन के शृंगार में किसी परी जैसी लग रही थी। बारात विदा हुई। कहार डोली में रुपसा को बिठाए लिए जा रहे थे। रास्ते में वही पहाड़ी नदी पड़ती थी। उसका रखवाला था एक मसाण। यानी भूत-प्रेत का सहोदर। एक दुरात्मा जिसे लोगों को सताने में मजा आता था।

भाग्यवश रुपसा को नदी किनारे डोली से बाहर आना पड़ा। मसाण ने देखा तो वह ऐसे अप्रतिम सौंदर्य को देख हक्काबक्का रह गया। ऐसा सौंदर्य उसने कभी भी कहीं भी नहीं देखा था। न देवों में, न दानवों में, न मनुष्यों में, न स्वयं के प्रेतों में ही।

और एक अप्राकृतिक घटना घट गई। उस मसाण को रुपसा से प्रेम हो गया। मसाणो का किसी नवव्याहता से प्रेम कर बैठना पहाड़ों में असामान्य नहीं माना जाता। बल्कि उनके उपद्रवों को शांत ही किया जाता है। और वे विशिष्ट पूजा के बाद शांत हो ही जाते हैं। इसे मसाण पूजा कहा जाता है। बल्कि अनेक नवव्याहताएं मसाणग्रसित होने का ढोंग भी करती ताकि नए घर के काम-काज से कुछ फुरसत मिले और सदा सर पर सवार सास का कुछ धन ही अपव्यय किया जाए।

पर यहाँ रुपसा को मसाण ने तंग न किया। वह उसे सच्चा प्रेम करने लगा। उधर दूसरे दिन रुपसा के पति का वेश धर मसाण गांव पहुँच गया। पिता ने इतनी जल्दी पुत्र के आने का समाचार सुना तो आशंकित हो उठे। पुत्र बोला कि उसे देस में एक साधु मिला था जिसने उसकी सेवा से प्रसन्न हो उसे एक मन्त्र दिया जिससे वह रोज एक सोने का सिक्का पैदा कर सकता है। उसी साधु ने शादी की बात बताई पर एक दिन का विलम्ब हो गया।

लालची पिता सोने के सिक्के की बात सुन चुप रह गया।

उधर प्रथम रात्रि को रुपसा की पति से भेंट हुई तो पति को असमंजस में पाया। अपने प्राणप्रिय को ऐसी अवस्था में देख वह व्यथित हुई। कारण पूछा तो मसाण ने वचन लिया कि वह जो कुछ बोलने जा रहा है किसी से न कहे। पति वचन को धर्म मानने वाली पहाड़ी स्त्री सहर्ष राजी हुई।

मसाण ने सारी बातें सच-सच बयान कर दीं। एक प्रेत के अपने प्रति ऐसे प्रेम को देखकर वह उसने उसे अपने पतिरूप में सहर्ष स्वीकार कर लिया।

दिन पर दिन बीतने लगे। लालची बाप को तो केवल स्वर्णमुद्राओं से प्रेम था और रुपसा को मसाण के प्रेम से प्रेम।

महीनों बीतने पर रुपसा का सचमुच का पति घर आया। गांव में कोहराम मच गया। दो दो पुरुष एक जैसे। कौन सच्चा कौन झूठा। अपने स्वयं के सच्चे होने के जो जो प्रमाण पति ने दिए वही प्रेत ने भी दिए। दोनों की बातें सच थीं। कोई इस समस्या से पार न पा सका। अंत में निर्णय हुआ कि राजा के पास ही कोई समाधान हो सकता है।

पिता दोनों को साथ ले चल पड़ा। प्रेत ऐसा सच्चा कि कोई माया न दिखाई। हाँ सच नहीं बोला। रस्ते में एक बकरी चराने वाला वृद्ध मिला। एक बूढ़े के साथ दो एक जैसे पुरुषों को देख वह चकरा गया।

जब उसे पूरी कहानी पता चली तो वह समझ गया कि इनमे से एक मसाण है। उसने युक्ति निकाली। बोला कि मैं आसानी से सच्चे बेटे का पता लगा सकता हूँ।
वह दोनों से बोला कि जो रुपसा से सच्चा प्यार करता हो वह मेरी बकरियों को जंगल से ले आए। प्रेत समझ तो गया पर रुपसा के प्यार की बात थी। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग किया। बकरियां तुरन्त ही चरवाहे के सामने आ गई। चतुर चरवाहा मुस्काने लगा। उसने रुपसा के नाम पर ऐसे काम करवाए जो मनुष्य के वश में ही नहीं। उसने अंत में एक बात कही। जो रुपसा से सच्चा प्यार करता हो वह इस बोतल में चला जाए। यह कहते ही उसने एक बोतल का ढक्कन खोल दिया। मसाण छोटा रूप धर बोतल में घुस गया। चरवाहे ने तुरंत बोतल का ढक्कन बंद कर दिया।

         ।।इति।।

नोट- यह कहानी मैंने लगभग 35 वर्ष पूर्व अपनी दादी से सुनी थी। इसका किसी फ़िल्म से कोई लेना देना नहीं है।

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